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वे दो प्रकार के लोग कौन हैं? पहला जो वचन को सुनते हैं दूसरा वे जो वचन को सुनकर मानते हैं!

 @ पहला जो वचन को मात्र सुनते हैं ::

  1. पवित्रशास्त्र बाइबल के अनुसार वे जो मात्र वचन को सुनते हैं मूर्ख मनुष्य के समान हैं। मत्ती 7:26
  2. और वे ऐसे मनुष्य के समान हैं जिनका घर रेत के ऊपर बना हो।
  3. और जब बारिश, बाढ़, आँधी मतलब इस संसार की चिंता, धन का धोखा, कष्ट या सताव जीवन में आता है तब वे ठोकर खाकर गिर जाते हैं।
  4. उनका जीवन बिना आधार के हैं अर्थात बिना बुनियाद का घर जैसा।
  5. उनका जीवन स्थिर नहीं रहता।
  6. वे पाप में गिरते रहते हैं।
  7. स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  8. अपने आप को मसीह या धर्मी जानकर धोखा देते हैं।
  9. वे धोखे में जीवन जीते हैं। याकूब1:22
  10. उनका जीवन दिखावटी होता हैं
  11. मात्र होंठो से परमेश्वर का आदर करने वाले।
  12. पाप व संसार व शैतान से समझौता का जीवन व्यतीत करने वाले ठहरते हैं। सिर्फ चंगाई, आश्चर्य के काम, सामर्थ के काम और भविष्यवाणी के ही पीछे भागते हैं परंतु वचन की सच्चाई के पीछे नहीं।
  13. वे व्यर्थ अपने आप को ज्ञानी समझते है और घमंड में जीवन जीते हैं।
  14. धन के लाभ के लिए भागते रहते हैं।
  15. भक्ति को कमाई का साधन बना लेते हैं।
  16. फरीसी और सदूकि के समान जीवन हो जाता है।
  17. जीवन आशीष से वंचित रहता है।


@ दूसरा जो वचन को सुनकर मानते हैं और चलते है ::

  1. पवित्रशास्त्र बाइबल के अनुसार वचन को सुनकर मानने वाले बुद्धिमान मनुष्य हैं।
  2. और उनका जीवन चट्टान में स्थित घर के समान हैं।
  3. जो बारिश, बाढ़, आंधी तूफान में भी स्थिर रहता हैं मतलब कष्ट या सताव आने पर भी जीवन स्थिर रहता है।
  4. उनका जीवन का आधार परमेश्वर के चट्टान रूपी वचन पर बना होता है।
  5. उनका जीवन मृत्यु के अंत तक चट्टान के समान रहता है।
  6. पाप का असर समाप्त हो जाता है।
  7. हर दिन स्वभाव परिवर्तित होता रहता है या नया होता रहता है।
  8. परमेश्वर उनको धर्मी रूप में ग्रहण करता है।
  9. अर्थात वे धर्मी है।
  10. उनका जीवन दिखावटी नही होता है।
  11. वे धोखे में जीवन नही जीते।
  12. पाप, संसार, शैतान से समझौता नहीं करते।
  13. वे आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर का आदर करते हैं।
  14. सिर्फ चंगाई और भविष्यवाणी के पीछे नहीं भागते परन्तु सब बातों को परखते हुए ग्रहण करते हैं।
  15. भक्ति और परमेश्वर के भय में जीवन जीते हैं।
  16. परमेश्वर को सदा प्रथम स्थान देते हैं
  17. वह सफल आशीषित और धन्य होता है।



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